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झारखण्ड रांची

बैंक ऑफ इंडिया अधिकारी संघ, झारखंड द्वारा बैंक राष्ट्रीयकरण दिवस की 50वीं वर्षगाँठ को वृक्षारोपण दिवस के रूप में मनाया गया


बैंक ऑफ इंडिया अधिकारी संघ, झारखंड राज्य इकाई की ओर से बैंक राष्ट्रीयकरण दिवस के उपलक्ष्य में बैंक ऑफ इंडिया, एनयूएसआरएल (NUSRL) कैम्पस शाखा में इस यादगार दिवस को वृक्षारोपण दिवस के रूप में मनाया गया।

इस विशेष दिवस में मुख्य अतिथि के रूप में श्री सुनील कुमार, महासचिव फेडरेशन ऑफ बैंक ऑफ इंडिया अधिकारी संघ एवं श्री राजकुमार श्रीवास्तव, अध्यक्ष, बैंक ऑफ इंडिया अधिकारी संघ, झारखंड राज्य इकाई, श्री सुनील लकड़ा, महासचिव, बैंक ऑफ इंडिया अधिकारी संघ, झारखंड राज्य इकाई, श्री रवीन्द्र कुमार सिन्हा, चेयरमेन, एआईबीओसी, झारखंड स्टेट, श्री कमलाकर सिंह, अध्यक्ष, एआईबीओसी, झारखंड स्टेट, श्री अरुण जॉन प्रबाल, महासचिव, SC/ST/OBC कर्मचारी संघ, झारखंड राज्य इकाई के साथ-साथ प्रबंधन पक्ष की ओर से बैंक ऑफ इंडिया के श्री चन्द्रशेखर सहाय, महाप्रबंधक एनबीजी, श्री संजीब कुमार सरकार, उप महाप्रबंधक एसएलबीसी, बैंक ऑफ इंडिया राँची अंचल के आंचलिक प्रबन्धक श्री तेजेश्वर पटनायक तथा उप आंचलिक प्रबंधक श्री उमेश कुमार रथ एवं श्री अनिल कुमार झा साथ ही बैंक ऑफ इंडिया अधिकारी संघ, झारखंड राज्य इकाई की तरफ से श्री प्रकाश उरांव, श्री विजय कुमार वाधवा, श्री भरत लाल ठाकुर, श्री वरुण कुमार, श्री अजय कुजूर, श्री चंद्रप्रकाश रुहिया, श्री समीर खलखो, श्री मनीष नारायण के साथ-साथ बैंक ऑफ इंडिया के तकरीबन 400 अधिकारी उपस्थित रहे।

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श्री सुनील लकड़ा ने स्वागत भाषण देते हुए इसे एक यादगार दिवस कहा साथ ही बताया कि 19 जुलाई 1969 की आधी रात से 14 बड़े वाणिज्यिक बैंकों का राष्ट्रीयकरण कर दिया। पूरे देश के 85 प्रतिशत जमा पूंजी इन्ही बैंकों में जमा थे। अध्यादेश जारी होने के दो सप्ताह के भीतर, संसद ने बैंकिंग कंपनियों (उपक्रम का अधिग्रहण और हस्तांतरण) विधेयक को पारित कर दिया, और इसे 9 अगस्त 1969 को राष्ट्रपति की मंजूरी मिल गई।


बैंक ऑफ इंडिया के श्री चन्द्रशेखर सहाय, महाप्रबंधक एनबीजी ने दीप प्रज्ज्वलन के बाद कहा कि बैंक एक ऐसा संस्थान है जो जनता से धन जमा करता है और व्यक्तियों के साथ-साथ फर्मों को भी धन उपलब्ध कराता है। ये बैंक के प्राथमिक कार्य हैं लेकिन एकमात्र नहीं हैं। वे अपने ग्राहकों को कई अन्य सेवाएं भी प्रदान करते हैं जैसे कि लॉकर सुविधा, धन का हस्तांतरण, ड्राफ्ट और पोर्टफोलियो प्रबंधन जारी करना आदि। बैंकिंग प्रणाली को भारतीय अर्थव्यवस्था की ‘रीढ़’ की हड्डी कहा जा सकता है। ये अपने पूर्ण अंश पत्रों के विक्रय, जनता से प्राप्त जमा सुरक्षित कोष, अन्य बैंकों तथा केन्द्रीय बैंक से ऋण लेकर प्राप्त करते हैं और सरकारी प्रतिभूतियों, विनिमय पत्रों, बाड़ों, तैयार माल अथवा अन्य प्रकार की तरल या चल सम्पत्ति की जमानत पर ऋण प्रदान करते हैं।


श्री संजीब कुमार सरकार, उप महाप्रबंधक एसएलबीसी ने कहा कि बैंकों के राष्ट्रीयकरण के ऐतिहासिक पर्व की शुरूआत करते समय श्रीमती इंदिराजी ने कहा था कि “बैंकिंग प्रणाली जैसी संस्था, जो हजारों -लाखों लोगों तक पहुंचती है और जिसे लाखों लोगों तक पहुंचाना चाहिए, के पीछे आवश्यक रूप से कोई बड़ा सामाजिक उद्देश्य होना चाहिए जिससे वह प्रेरित हो और इन क्षेत्रों को चाहिए कि वह राष्ट्रीय प्राथमिकताओं तथा उद्देश्यों को पूरा करने में अपना योगदान दें। ”


बैंक ऑफ इंडिया राँची अंचल के आंचलिक प्रबन्धक श्री तेजेश्वर पटनायक ने बताया कि राष्ट्रीयकरण से पूर्व इनका उद्देश्य तथा बैंकिग प्रणाली थोड़ी भिन्न प्रकार की थी किन्तु प्रमुख बैंकों के राष्ट्रीयकरण के साथ ही इनकी कार्य प्रणाली तथा अंतर्गत परिचालन की दशा एव दिशा में आमूलाग्र परिवर्तन हुए हैं। इस परिवर्तन के पीछे बैंकों के राष्ट्रीयकरण का मूल उद्देश्य निहित है। अत: भारतीय बैंकिंग व्यवस्था के प्रमुख वाणिज्यिक बैंको के राष्ट्रीयकरण की घटना युगप्रवर्तक मानी जा सकती है। बैंक राष्ट्रीयकरण के साथ ही भारतवर्ष की सामाजिक तथा आर्थिक विकास की दिशा उन्नत करने वाले एक नए पर्व की शुरूआत हुई है।

इस विशेष मौके पर पँहुचे माननीय विशेष अतिथि श्री सुनील कुमार महोदय ने कहा कि राष्ट्रीयकरण के बाद बैंकों की शाखाओं में बढ़ोतरी हुई। शहर से उठकर बैंक गांव-देहात की तरफ चल दिए। आंकड़ों के मुताबिक जुलाई 1969 को देश में बैंकों की सिर्फ 8322 शाखाएं थीं। 1994 के आते आते यह आंकड़ा साठ हज़ार को पार कर गया। इसका यह फ़ायदा हुआ कि बैंकों के पास काफी मात्रा में पैसा इकट्टा हुआ और आगे बतौर कर्ज बांटा गया।

श्री राजकुमार श्रीवास्तव, अध्यक्ष, बैंक ऑफ इंडिया अधिकारी संघ, झारखंड राज्य इकाई ने वेतनवृद्धि में देरी के लिए कड़े शब्दों में मौजूदा केंद्र सरकार और भारतीय बैंकिंग संघ की निंदा की जो कि नवंबर 2017 से होनी चाहिए थी और अधिकारियों की तत्काल प्रभाव से वेतनवृद्धि की मांग की एवं कहा कि एक तरफ तो सरकार छोटे-छोटे नए बैंकों को लैसेंस जारी कर रही है और दूसरी तरफ कमजोर बैंक के नाम पर राष्ट्रीयकृत बैंकों का विलय किया जा रहा है। बैंक राष्ट्रीयकरण के पूर्व किसानों की हालत इतनी खराब होती थी कि उनके बारे में एक कड़वा सत्य कहा जाता है कि भारतीय किसान कर्ज में ही जन्म लेता है। कर्ज में ही पलता है और पीछे कर्ज छोड़कर ही मरता है। फलत: ऐसी दशा में पूंजीपति अधिक धनवान होते गए तथा निर्धन और भी गरीबी के दो पाटों में पिसते गए और देश में भयंकर सामाजिक असंतुलन का संकट पैदा हो गया। सामाजिक असंतुलन के साथ ही राष्ट्र जबर्दस्त आर्थिक विषमताओं के कोढ़ में उलझ गया। इस प्रकार सामाजिक तथा आर्थिक विकास की गति अवरुद्ध होती गई जिसके फलस्वरूप क्रांतिकारी नई आर्थिक नीति की आवश्यकता महसूस की जाने लगी थी। मौजूदा सरकार पुनः देश को उसी स्थिति में लेकर जा रही है।

श्री रवीन्द्र कुमार सिन्हा, चेयरमेन, एआईबीओसी, झारखंड स्टेट ने बैंकों के निजीकरण का पुरजोर विरोध करते हुए इसे सरकार की मनमानी करार दिया। इससे देश की अर्थव्यवस्था पूंजीपति और उद्योगपति घरानों में ही सीमित होकर रह जाएगी तथा देश की अधिकतर गरीब जनता इससे लाभान्वित नहीं हो पाएंगे।
श्री कमलाकर सिंह, अध्यक्ष, एआईबीओसी, झारखंड स्टेट ने बैंक अधिकारियों की लंबे समय से लंबित निम्नलिखित मांगों को बताया –

  1. स्केल-1 से लेकर स्केल – 7 तक के सभी अधिकारियों को केंद्र सरकार के अन्य कार्यालयों के समान वेतन।
  2. चार्टर ऑफ डिमांड के अनुरूप वेतन समझौता।
  3. बैंक अधिकारियों को कार्य समय सुनिश्चित हो, ताकि वह अपने परिवार को भी समय दे सकें।
  4. सप्ताह में 5 दिनों का कार्यदिवस ।
  5. पारिवारिक पेंशन एवं पेंशन का अपडेशन।
  6. तृतीय पक्ष के उत्पादों की गलत बिक्री को रोक।
  7. एनपीए रिकवरी करना तथा बैंक के मूल वास्तविक कार्य को करना।
  8. नई पेंशन नीति को रद्द करते हुए पुराने पेंशन नीति को लागू करना।
  9. आईडीबीआई बैंक तथा कैथॉलिक सीरियन बैंक के मानव संसाधन विभाग से संबन्धित मुद्दों पर तत्काल समाधान।
  10. बैंकों के आपस में विलय पर तत्काल रोक लगाया जाना चाहिए।
  11. क्षेत्रीय ग्रामीण बैंकों के अधिकारियों को भी राष्ट्रीयकृत बैंकों की तर्ज पर पेंशन एवं अन्य लाभ दिया जाना।
    श्री अरुण जॉन प्रबाल, महासचिव, SC/ST/OBC कर्मचारी संघ, झारखंड राज्य इकाई ने कहा बैंकर्स को कोर बैंकिंग करने के अवसर दिये जाएँ । आज थर्ड पार्टी प्रॉडक्ट का प्रेशर है । उन्होने बैंकों के विलय का भी विरोध किया और बताया कि इससे SC/ST/OBC वर्गों के लिए रोजगार के अवसर कम होंगे।

श्री अजय कुजूर तथा श्री भरत लाल ठाकुर ने कहा कि वर्तमान हिटलर सरकार राष्ट्रीयकृत बैंकों के निर्माण के उद्देश्य से ही भटक रही है, जिसका मुख्य उद्देश्य था बैंकिंग सुविधाओं तथा सेवाओं का विस्तार करना, बैंकिग सेवाओं एवं सुविधाओं का लाभ समाज में सभी वर्गों विशेषत: ग्रामीण कस्बाई क्षेत्रों में बसे कमजोर वर्गों तक पहुंचाने का मूल उद्देश्य बैंकों के राष्ट्रीयकरण में निहित है।

श्री मनीष नारायण तथा श्री चंद्रप्रकाश रुहिया ने बताया कि बैंक राष्ट्रीयकरण के पहले देश में आर्थिक संकट उत्पन्न होने के कारण आर्थिक विकास की गति अवरुद्ध हो गई थी। अत: देश के आर्थिक विकास में तेजी लाने के लिए बैंको का राष्ट्रीयकरण किया गया, क्योंकि किसी भी देश की प्रगति एवं खुशहाली के लिए उसके आर्थिक विकास की ही महत्वपूर्ण भूमिका रहती है। आज देश फिर से उसी स्थिति में वापस जा रहा है।

श्री विजय वाधवा तथा श्री प्रकाश उराँव ने बताया कि ये एक वृक्ष समान है जिसे वर्ष 1969 में लगाया गया था और आज की अर्थव्यवस्था उसी वृक्ष का फल है, इसी कारण आज के इस 50वीं वर्षगांठ को बैंक ऑफ इंडिया अधिकारी संघ की तरफ से इस दिवस को वृक्षारोपण दिवस के रूप में मनाया जा रहा है। इसी के साथ राँची अंचल के सदस्यों की क्लस्टर बैठक के साथ कार्यक्रम का समापन किया गया।